हवाओं से डरते हैं।

न पीर,न काहीन, न क़ज़ा न खुदाओं से डरते हैं,
ये बुज़दिल हैं अमन की हवाओं से डरते हैं।
मरम्मत की साख पर अपना जिस्म सौंपने वाले,
अब वो हकीम की दवाओं से डरते हैं।
वो बेखौफ खुलेआम काले कारनामे करते हैं,
एक हम हैं जो गरीब की बद्दुआओं से डरते हैं।
तेरी गद्दारी बर्दाश्त कर जो लोग रवादारी से बैठे हैं,
झूठ है कि वो अदालत की सज़ाओं से डरते हैं।

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