डर लगता है।

बुलंदियों को छूने में समय कब लगता है।
मुझे मंज़िल से खूबसूरत सफर लगता है।

ख्वाब तो हमारे भी थे मीलों दूर जाने के,
मगर उसी रास्ते में मेरा घर लगता है।

बेटा घर की दहलीज़ बढ़ाने को कहता है लेकिन,
क्या करें बीच में शजर लगता है।

हम भी जश्न मनाते थे अपने घर में कभी,
मगर अब बेटी होती है तो डर लगता है।

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