रैन

कभी यूँ भी हम रातें गुज़ारा करते हैं,
कागज़ पर लिखते हैं, मिटाया करते हैं।

शहर से दूर अपने गांव की याद में,
बगीचे की धूल उड़ाया करते हैं।

अपने बच्चों का बचपन फिर देखने को,
बूढ़े कंधों पर पोतों को घुमाया करते हैं।

करीबी दोस्तों की याद में अक्सर,
लाल मिर्चियाँ आंगन में सुखाया करते हैं।

बड़े बदनसीब हुआ करते हैं वो बाप,
जो अपना कहकर बेटियों को पराया करते हैं।

कभी उस शख्स की आंखों में उतारना,
दिल का दर्द जो मुस्कुराकर छुपाया करते हैं।

बस इसी कश्मकश में रोज़ रहते हैं,
रुकते हैं सोचते हैं फिर कलम उठाया करते हैं।

कभी यूँ भी हम रातें गुज़ारा करते हैं,
कागज़ पर लिखते हैं, मिटाया करते हैं।

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