दो भाई।
तीज-ओ-त्योहार के साबिल का इम्तेहान भी मेरा था,
मगर दीवाली भी मेरी थी रमज़ान भी मेरा था।
क़ज़ा ने बांट दिए कुदरत के जुफ्त को भी,
वरना ये ज़मीं भी मेरी थी आसमान भी मेरा था।
मुल्क की आज़ादी में जो लोग शहीद गए,
वो हर एक भाई हिन्दू भी मेरा था मुसलमान भी मेरा था।
मज़हब की लड़ाई में जो जल के खाक हो गए,
वो बस्ती भी मेरी थी मकान भी मेरा था।
एक घर को लकीर के दो मुल्क बना दिये,
वरना हिंदुस्तान भी मेरा था पाकिस्तान भी मेरा था।
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